Ram Manohar Lohia ने कहा था—
कील ठोक लो,
झंडा गाड़ लो,
ताकि समाज और नीचे न गिरे।
आज तकनीक उठने की कोशिश में है,
पर हर दिन के आख़िरी बीस मिनट पर
आकर गिर जाती है।
सिनेमा ने डराकर बताया—
ये बीस मिनट
किसी दिन पाँच मिनट भी हो सकते हैं,
और उम्र भी गिरते-गिरते
एक वयस्क से
स्कूल के बच्चे तक सिमट सकती है।
गिरावट जारी है।
अर्थशास्त्र में,
सरकार और समाज ने
द्वितीय विश्व युद्ध के समय
आर्थिक पतन को रोकने के लिए
कई प्रयास किए थे।
उन प्रयासों में लोहिया की कविता नहीं थी—
पर आज,
जब आँकड़े बीस मिनट तक गिर चुके हैं,
और पाँच मिनट तक सिमटने का खतरा है,
शायद
लोहिया की कविता की ज़रूरत है।
क्या कविता
अस्सी को गिरा सकती है?
क्या वह बीस मिनट को
एक मधुर सामाजिक राह बना सकती है—
जिस पर हम सब
साथ-साथ उतर सकें,
और बीस से कई वर्षों की प्रतीक्षा को
एक दिशा दे सकें?
हर बीस मिनट में
जो अन्याय होता है—
घर में, रास्तों में,
समाज के हर कोने में—
उसे चाहिए एक दृष्टिकोण,
एक नुकीली कील-सा विचार,
जैसा लोहिया ने दिया था।
शायद तब
बीस मिनट की ट्रोलिंग भी थम जाएगी,
और समाज
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