Thursday, April 23, 2026

धुवां की ऋण

रुवा-रुवा सा कच्चा धुआँ,

ज़िंदगी की भीनी-भीनी जीवा।

हार में छिपी जीत का ऋण,

कितने तारे होकर गए संगीन।


दूर से देखो तो एक अद्भुत दौर है,

जिसका हर आरंभ अपने अंत की ओर है।

अंत के ऊपर ही तो जीवन ठहरता है—

या शायद आरंभ और अंत के बीच ही बिखरता है।


गिरने से पहले टिमटिमाते तारे,

खामोशी में ही टूटकर बिखर जाते हैं।

हम चाँद से उन्हें देख भी नहीं पाते—

बस अंधेरे में उनके निशान रह जाते हैं।


क्या कभी चाँद भी पृथ्वी पर गिरता है?

या केवल उसकी छाया ही ग्रहण बन जाती है?

तो क्या हर गिरावट एक ग्रहण है—

रोशनी के क्षण भर के खो जाने का दर्पण है?


इसी तरह क्या Berlin Wall भी गिरी थी—

ईंटों में नहीं, इतिहास के सीने पर?

अगर किसी को इसका उत्तर मिले,

तो ज़रा हमें भी बता देना इस सफ़र पर।

No comments:

Post a Comment